गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

प्रतिक्षा

राधिका ने अपने अश्रुपूर्ण नेत्रों से उस अन्धकारमय नील कि ओर देखा ,जहाँ असंख्य सितारो के मध्य .आज चन्द्रमा मे



सर्वप्रिये, श्रीजी स्वम साक्षात साकार हो उठे हो .ऐसा प्रतीत हो रह था उनके कमल-नयनो कि सम्मोहक ज्योति उसके चित को विकल किए दे रही हो ,'उनके अधरो कि मन्द-मन्द मुस्कान उसके ह्रदय कि घनीभूत पीडा का रसपान कर रही हो .उसके हृदय -उधाधि मे पीडा कि ऊची -ऊची लहरे उठ्ने लगी,जिनमे मे मन ऑर मस्तिस्क डूबने-उतरने लगा .जाने अन्जाने जिन सत्य -स्वरूप श्रीजी को चाहने की वो धर्षता कर बेठी है , निसंध्य उनकी कामना करना तो चद्र्मा को अपने मस्तक पर प्रतिष्ठित करने जैसा है, ' पर मै अब अपने व्याकूल ह्रदय का क्या करू ,जो हर सजीव ऑर निर्जीव वस्तु मै आप ही को ख़ोज लेता है



आप तो स्वयं अन्तर्यामी है. आज अपनी लोक-लाज का परित्याग कर मुझे ये कहने मे तनिक भी संकोच नही ,'कि आपके प्रेम मे ,मै अपनी सुध -बुध खो बेठी हूँ.पर इन सब मे मेरा क़ोई कसूर नहीं ,'यह सारा जग तो आपके प्रेम मे ही तो पागल है .



मेरी यह ध्र्स्टता क्षन्त्व्य हों,अब मेरे जीवन कि यही अभिलाषा है कि अपनी अन्तिम सांस तक आपकी द्रष्टि -परिधि मे रह्ते हुए अपने अश्रूजल से सदैव आपके चरण पखारती रहूँ.



मै यह भली-भाँती जानती हूँ कि यह अभिलाषा मात्र मेरे ह्रदय मे ही नही पलती



अश्रूजल कि असंख्य धारायें आपके चरनो का स्पर्श पाने को व्याकूल रहती है. किन्तु आपकी यह राधिका तो आपके चिन्तन को ही अपने जीवन का उदेश्य मान चुकी है .आपके चरनो कि धुलि पाकर



ही ये जीवन सार्थक होगा अन्यथा .......!



समस्त संसार गहन नींद सो रहा है ,रात आधी से ज्यादा बीत चुकी है प्रभु पर मेरी आँखो से नींद कोसो दूर है .एक चिन्ता जो मेरे मन को खाए जा रही है ,कि आखिर आपको अपनी पीडा से कैसे अवगत करु ,सभी उपाए तो विफल हो चुके है .लोकलाज ऑर संस्कारो ने मेरे पावों मे बैड़िया पह्ना दी है



मन ऑर मस्तिष्क के युद्ध मे उसका मन ही जीत गया ,' पत्र से भला ऑर क्या उपयुक्त हो सक्ता है .अपने प्रेम को शब्दो मे पिरो कर वो अपने मन की कह देगी . भला जग मे उनके सिवा कौन है जो उसके प्रेम की विकलता समझ सके ,'राधिका का मस्तिस्क फिर उसे चैताने लगा ,'जिस एक तरफा प्रेम के वशीभूत हो तो ये संदेश लिखने का साहस कर रही है क्या तेरा प्रेम उनके स्वीकार के योग्य भी होगा ,संसार की सुन्दरतम वस्तुओं से घिरे रहने वाले तेरे सर्वप्रिय क्या तेरे साधारण प्रेम की ऑर आकर्षित होंगे भला !.राधिका की आँखों मे आंसू झिलमिलाने लगे. यह तो उस ने सोचा ही नही था ,उसने तो बस प्रेम किया था ऑर उसका प्रेम निर्मल वैतरणी की तरह स्वछ है .उसके प्रेम का गुण मात्र शीतलता ही है .



राधिका ने अपने कक्ष के द्वार बन्द करके एक मधम सी ज्योति का प्रकाश किया .उसके मनमन्दिर मे सुशोभित मूरत मानो किसी दिव्य आलोक से जगमगा उठी .राधिका ने भोजपत्र को कुछ ऐसे स्पर्श किया मानो ,अपने सर्वप्रिये के चरनो मे पुष्प अर्पित किए हो .एक बात जो उसके मन को दिलासा दे रही थी की उसके प्रेम को कोइ अर्थ मिले या न मिले किन्तु उसके शब्द श्री कृष्ण कि नज़रो के सामने से गुज़र ,सार्थक हो जायेंगे ,अमर हो जाएंगे .उसकी अंतरव्यथा तो ऊसी वक्त मरहम पा लेगी जब वह उसके पत्र को स्पर्श कर उसके जीवन को एक नया अर्थ देंगे .



अपने आराध्य देव को मन की गहरईयों से याद करते हुए राधिका ने पत्र का शुभारम्भ किया .



सर्वप्रिये



श्री कृष्ण के चरनो मे सप्रेम स्पर्श



हे परमेश्वर आप तो सर्वज्ञानी है यह सारी श्रष्टि आप ही के आधीन है ,तीनो लोको मे भला



ऐसी कौन सी व्यथा है जो आप हर नहीं सकते ,आप तो अंतरयामी है ,'मै जड़ मुर्ख फिर भी आपके समक्ष अपनी व्यथा का गान कर रही हूँ .मेरा ह्रदय अब मेरे वश मे नहीं वो आपके आधीन हो चुका है . स्वं श्वेताम्बर साक्षी है मेरी इस गहन पीड़ा के .आप रोज गहन रात्री मे कप उनके स्वरुप मे प्रवेश कर जाते है इसका पता ही नही चलता . अब तो हमारी मूक बातों का एक लम्बा अध्याय बन चुका है एक और साक्षी है मेरी इस वेदना की ,''मेरी आँखों से बहने वाली वैतरणी जो अक्सर सभी बांध तोड़ कर बहा करती है."!!!!!!!!!



क्रमश

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर अतिसुन्दर सारगर्भित रचना , बधाई

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  2. राधिका की प्रेम विव्हलता को आपने हमारे सम्मुख चित्रित कर दिया ।

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  3. आपने अपनी प्रस्तुति को बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया है । सदा सृजनरत रहें ।मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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