बुधवार, 29 दिसंबर 2010

विलाप

सुन अग्नि का वो करुण विलाप
तरु भी सिसक पड़े
खग, विहग भी बौराए से बिलख पड़े
हाय !कौन सी दिशा जाकर हम
मदद लिवा ले आये .
धरा देख वो अग्निकांड ,बिलख पड़ी !
आह ! ज्वाला  तेरी लपटों में तो देख
मेरी सोंधी गंध भी मिट गयी
अब मेरी देह से तो मेरे बच्चों के जलने की गंध आती है
आह मुझ से न देखा जायेगा मेरे ही अंश का ऐसे जलना
क्या सुन रही हो तुम इस माँ की करुण पुकार
या फिर निस्पंद हो गयी हो जल, जल  कर इतनी बार
मत जल इतना तू , पापिन कहलाएगी
कहाँ धोएगी भला खुद को
इतनी कलुषित , मलिन तू हो जाएगी
तेरी मलिनता से शायद
वो गंगा भी मैली हो जाएगी

3 टिप्‍पणियां:

  1. agni jahan pavitr kaaryon me kaam aati hai vahi shamshaan me bhi kaam aati hai yahi agni ki niyati hai aur yahi agni ko shrap bhi...aaj apki post padh kar ye pauranik prasang yaad aa gaya.

    bahut marmik rachna.

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  2. निसंदेह ।
    यह एक प्रसंशनीय प्रस्तुति है ।
    धन्यवाद ।
    satguru-satykikhoj.blogspot.com

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  3. अच्छी कविता ,
    कविता अभिशप्त पढ़ नहीं पाया क्योंकि गैजेट उपर आ रहा था , शायद यह समस्या औरों को भी आ रही हो , हो सके तो live traffic feed को अन्य जगह लगाएं
    sahityasurbhi.blogspot.com

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